बहुत से ट्रांजिस्टर, रेजिस्टेंस, डायोड, कैपैसिटर आदि से बनने वाले एक अथवा कई जटिल सर्किटों का कार्य केवल एक I.C. लगाकर किया जा सकता है। किसी-किसी I.C. में सैकड़ों ट्राजिस्टर, रेजिस्टेंस आदि से बने हुए बहुत से सर्किट होते हैं। आई.सी. से कुछ पिनें निकली होती हैं जिन्हें बाहर के कनैक्शन के लिये प्रयोग किया जाता है। I.C. का नम्बर I.C. के ऊपर छपा रहता है । पिन नं. 1 को पहचानने के लिए कोई निशान बना हुआ रहता है। यदि पिनों को ऊपर की तरफ कर लिया जाय तो निशान के पास वाली पिन का नं. 1 होता है तथा घड़ी की सुई घूमने की दिशा में गिनती करने पर पिनों का नम्बर बढ़ता जाता है।
टी.वी. में प्रयोग किये जाने वाले I.C. की संख्या
टी.वी. सर्किटों के लिये आजकल बहुत से आई.सी. उपलब्ध हैं। विभिन्न कम्पनियों के टेलीविजनों में आजकल 1 से लेकर 7 आई. सी. प्रयोग किये जाते हैं। आई.सी. की संख्या कम होने पर ट्रांजिस्टरों की संख्या अधिक होती है क्योंकि 1 आई.सी. कई ट्रांजिस्टरों का कार्य करता है।
टैक्सला टाइप टी.वी. में 5 आई.सी. प्रयोग किये जाते हैं। इनके नम्बर CA 3068, CA 120, ТВА 810, CA 920 तथा TDA 1044 |
अपट्रॉन टाइप टी.वी. में केवल 2 आई. सी. प्रयोग किये जाते हैं। इनके नम्बर CA 3068 तथा TBA 120 हैं।
तरंग तथा सिगनल
तरंग तथा सिगनल का अर्थ बिल्कुल अलग-अलग है। टी.वी. स्टेशन में हो रहे प्रोग्राम को टी. वी. रिसीवर पर दिखाने तक कई बार तरंगों को सिगनल में तथा सिगनल को तरंगों में बदलना पड़ता है अतः तरंग तथा सिगनल के अन्तर को समझना आवश्यक है ।
ध्वनि तरंग
किसी के बोलने से आसपास के वायुमंडल में कम्पन होते हैं। इन कम्पनों को ध्वनि तरंग कहा जाता है । जब यह कम्पन कान के परदे पर टकराते हैं तो आवाज सुनाई पड़ती है। वायुमंडल में इन कम्पनों का वेग करीब 330 मीटर प्रति ऐकिंड होता है ।
इन कम्पनों में कोई इलेक्ट्रिक करेंट नहीं चलती, तवा कोई वोल्ट नहीं बनते ।
औडियो सिगनल
आवाज के तेज मंदी होने के प्रभाव से किसी सर्किट में यदि इलैक्ट्रिक करेंट का मान बदले तो इस सर्किट में ए.सी. वोल्टस उत्पन्न होंगे। इन ए.सी. बोल्टस को ऑडियो सिगनल कहा जाता है।
ध्वनि तरंगो को औडियो सिगनल में बदलना
इसके लिये माइक्रोफोन को डी.सी. सप्लाई तथा एक रेजिटेंस के साथ जोड़ा जाता है। कार्बन माइक्रोफोन में डाइफ्राम तथा कार्बन छड़ के बीच में कार्बन के कण भरे होते हैं। डी.सी. सप्लाई देने पर सर्किट में करेंट चलती है। ध्वनि तरंगों के डाइफ्राम से टकराने पर डाइफ्राम आगे पीछे चलती है । इससे कार्बन के कण दबते हैं तथा माइक्रोफोन का रेजिस्टेंस बदलता है। इससे सर्किट की करेंट में परिवर्तन होता है तथा 100 ओम के रेजिस्टेंस पर डी.सी. वोल्टस के साथ-साथ ए.सी. बोल्टस भी उत्पन्न होते हैं। ये ए.सी. वोल्टस ही औडियो सिगनल हैं जिन्हें कैपेसिटर द्वारा डी.सी. वोल्टस से अलग कर लिया जाता है ।
औडियो सिगनल को ध्वनि तरंगों में बदलना
औडियो सिगनलों को ध्वनि तरंगों में बदलने का कार्य लाउड स्पीकर करता है। लाउड स्पीकर में एक बेलनाकार चुम्बक होता है। इसके उत्तरी ध्रुव तथा दक्षिणी ध्रुव के बीच में बेलनाकार गैप होता है। इस गैप में कागज की लचकीली कौन का छोटा भाग आता है। इस भाग पर एक कोइल लगी होती है। कौइल को औडियो सिगनल देने से कौइल में करेंट बहती है। करेंट से बनने वाला चुम्बकीय क्षेत्र, बेलनाकार चुम्बक से क्रिया करता है जिससे कोइल गैप में आगे पीछे चलता है । कौइल के चलने से कोन में कम्पन होते हैं। कोन में कम्पन होन से बायुमंडल में कम्पन होते हैं तथा वायुमंडल में ध्वनि तरंगे उत्पन्न हो जाती हैं।
इलैक्ट्रो-मेगनैटिक तरंगें
प्रकाश तरंग, उष्मा तरंग, एक्सरे तरंग, रेडियो तरंग, टी.वी. तरंग आदि इलैक्ट्रो मैगनेटिक तरंगों के कुछ उदाहरण हैं। ध्वनि तरंगों की तरह इनमें भी एम्पीयर या पोल्ट नहीं होते हैं। ये विद्युतीय क्षेत्र तथा चुम्बकीय क्षेत्रों की बनी होती है। ये आकाश अथवा वायुमंडल में तीस करोड़ (300,000,000) मीटर प्रति सेकिंड के वेग से चलती हैं।
रेडियो तरंगें उत्पन्न करना
अधिक फ्रीक्वेंसी की ए.सी. करेंट यदि एक लम्बे एरियल में बह रही हो तो एरियल से इलेक्ट्रो
मैगनैटिक तरंगे निकलने लगती हैं। इन तरंगों को रेडियो तरंगें कहा जाता है । रेडियो तरंगें तभी उत्पन्न होती हैं जब एरियल की लम्बाई मीटरों में (300,000,000) + (ए.सी. करेंट की फ्रीक्वेंसी) के आसपास हो ।
यदि 15 हर्टज की करेंट के लिये एरियल की लम्बाई निकाली जाय तो (300,000,000) + 15 = 20,000,000 मीटर = 20,000 किलोमीटर होगी। इतना लम्बा एरियल बनाना संभव नहीं है। अधिक फ्रीक्वेंसी की करेंटों के लिये ही एरियल बनाना संभव है।
टी.वी. तरंगों तथा रेडियो तरंगों में अन्तर
रेडियो स्टेशनों पर 550 किलो हर्टज से लेकर 25 मैगा हर्टज तक के ए.सी. सिगनलों से इलेक्ट्रोमैगनैटिक तरंगें बनायी जाती हैं। टी.बी. स्टेशनों पर 45 मैगाहर्टज से लेकर 890 मैगाहर्टज तक के ए.सी. सिगनलों से इलेक्ट्रो मैगनेटिक तरंगें बनाई जाती हैं। इन सभी फ्रीक्वेंसियों को रेडियो फ्रीक्वेंसी कह दिया जाता है। इनसे उत्पन्न होने वाली सभी तरंगों को रेडियो तरंगों के नाम से जाना जाता है। टी.वी. का प्रोग्राम लाने वाली तरंगो को भी रेडियो तरंगे कह दिया जाता है।
प्रश्न
- I.C. के अंदर कितने तथा कौन-कौन से पुर्जे होते हैं ?
- I.C. का प्रयोग क्यों बढ़ता जा रहा है ?
- I.C. की पिनों को किस प्रकार पहचाना जाता है ?
- टैक्सला टी.वी. में प्रयोग किये जाने वाले 1.C. के नम्बर लिखिये ।
- अपट्रौन टी.वी. में कितनी I.C. प्रयोग किये जाते हैं ? इनके नम्बर क्या हैं ?
- ध्वनि तरंगों से क्या अभिप्राय है ?
- क्या ध्वनि तरंगों में कोई इलैक्ट्रिक करेंट चलती है ?
- औडियो सिगनल से क्या अभिप्राय है ?
- किस यंत्र से ध्वनि तरंगों को ओडियो सिम तल में बदला जाता है? इस यंत्र की कार्य प्रणाली चित्र बनाकर समझाइये ।
- लाउडस्पीकर क्या कार्य करता है तथा किस प्रकार यह कार्य करता है ? चित्र बनाकर समझाइये
- इलैक्ट्रोमैगनैटिक तरंगों के उदाहरण दीजिये तथा ध्वनि तरंगों से इनके वेग की तुलना कीजिये
- रेडियो तरंगें उत्पन्न करने के लिये आवश्यक एन्टीना की लम्बाई का सूत्र लिखिये