प्रत्येक टी.वी. में तीन औसीलेटर सर्किट प्रयोग किये जाते हैं । इन्हें हौरीजीन्टल औसीलेटर, वर्टीकल औसीलेटर तथा ट्यूनर का रेडियो फ्रीक्वेंसी औसीलेटर कहा जाता है ।
औसीलेटर का कार्य
औसीलेटर सर्किट को डी.सी. वोल्ट देते ही इसके आउटपुट पर ए.सी. सिगनल निकलने लगते हैं। अलग-अलग सर्किटों से अलग-अलग फ्रीक्वेंसी तथा अलग-अलग आकृति के ए.सी. सिगनल बनाये जा सकते है ।
एम्प्लीफायर तथा औसीलेटर की तुलना
एम्प्लीफायर सर्किट कम बोल्ट का सिगनल लेकर अधिक वोल्ट का सिगनल देता है, जबकि औसीलेटर पर बाहर से कोई सिगनल नहीं दिया जाता। औसीलेटर अपने आप सिगनल उत्पन्न करता है ।
चार्जड कैपेसिटर को कौइल से जोड़ने का प्रभाव
चार्जड कैपेसिटर को कौइल से जोड़ने पर कौइल में ए.सी. करेंट बहने लगती है। यह करेंट कौइल के सिरों पर ए.सी. वोल्टस उत्पन्न करती हैं अर्थात कौइल के सिरों पर ओसीलेशन्स उत्पन्न हो जाते हैं। चार्जड कैपेसिटर को कौइल से जोड़ते ही कैपेसिटर के (-) सिरे से (+) सिरे की ओर इलेक्ट्रोन कौइल में होकर बहने लगतेहैं। इस करेंट के कारण कौइल में बदलने वाला चुम्बकीय क्षेत्र वनता है। इस क्षेत्र के कारण कौइल में वोल्टस बनते हैं। यह बोल्टस कैपेसिटर के (-) सिरे से इतने आंध एक इलैक्ट्रोन खींचते हैं कि (-) वाला सिरा (+) बन जाता है तथा (+) याला सिरा (1) वन जाता
अब इलैक्ट्रोन फिर (-) सिरे से (+) सिरे की ओर चलते हैं तथा यही क्रिया वार-बार होती है। इससे कौइल में ए.सी. करेंट बहने लगती है तथा कोइल और कैपेसिटर के सिरों पर आओसीलेशन्स के सिगनल मिलने लगते हैं।
औसीलेटर की फ्रीक्वेंसी
यह कौइल तथा कैपेसिटर के मान पर निर्भर करती है। कम कैपेसिटी का कैपेसिटर लगाने से
फ्रीक्वेंसी बढ़ती है । कम टनों का कौइल लगाने से भी फ्रीक्वेंसी बढ़ती है।
औसीलेटर सर्किट में ट्रांजिस्टर की आवश्यकता
कौइल का कुछ रेजिस्टेंस होता है अतः कोइल में करेंट चलने से गरमी उत्पन्न होती है। कंपसिटर को बैटरी द्वारा एक बार चार्ज करने में दी गयी इलैक्ट्रिक इनर्जी कुछ औसीलेशन्स में ही गरमी में बदल जाती है जिससे औसीलेशन्स बन्द हो जाते हैं।
यदि डी.सी. सप्लाई से कुछ इनर्जी लेकर बार-बार कैपेसिटर को दी जाय तो ओसीलेशन्स बराबर होते रहते हैं। औसीलेटर सर्किट में ट्रांजिस्टर यही कार्य करता है ।
हार्टले औसीलेटर सर्किट
ट्रांजिस्टर का एमीटर बैटरी के (-) से जुड़ा हुआ है। स्विच औन करते ही कलेक्टर को, कौइल L1 में होकर 6 बोल्ट मिलने लगते हैं तथा बेस को कौइल L2 तथा 100 किलोओम में होकर 0.6 बोल्ट या अधिक मिलने लगते हैं। ट्रांजिस्टर के बेस तथा कलेक्टर को आवश्यक बोल्टस मिल जाने के कारण कलेक्टर में करेंट चलनी चाहिये । परन्तु कोइल L1 की उपस्थिति के कारण यह करेंट धीरे-धीरे बढ़ती है। इस बदलती करेंट के चुम्बकीय प्रभाव के कारण L2 में वोल्टस उत्पन्न होते हैं जो बेस पर पहुंचकर वालेक्टर करेंट को और बढ़ाते हैं। बेस वोल्टस के एक सीमा तक बढ़ने के बाद कलेक्टर करेंट नहीं बढ़ती। अतः उल्टा चुम्बकीय प्रभाव पैदा होता है तथा कलेक्टर करेंट घटने लगती है। एक सीमा तक घटने के बाद यह फिर बढ़ने लगती है । कैपेसिटर C बार-बार चार्ज डिस्चार्ज होता है तथा इसके सिरों पर औसीलेशन्स सिगनल मिलने लगते हैं।
प्रश्न
- औसीलेटर सर्किट क्या कार्य करता है ?
- औसीलेटर से निकलने वाले कुछ सिगनलों के चित्र बनाइये । 3. किस सप्लाई को देने से औसीलेटर कार्य करने लगता है ?
- एम्प्लीफायर तथा औसीलेटर के कार्यों में क्या अन्तर है ?
- एक कौइल के सिरों पर औसीलेशन्स कब उत्पन्न होते हैं ?
- औसीलेशन्स की फ्रीक्वेंसी किन मानों पर निर्भर करती है ?
- औसीलेशन्स बनाये रखने के लिये ट्रांजिस्टर की आवश्यकता क्यों पड़ती है ?
- हार्टले औसीलेटर का सर्किट डाइग्राम बनाइये तथा इसकी कार्य प्रणाली समझाइये ।
- टी.वी. में कितने औसीलेटर सर्किट कार्य करते हैं ? इन्हें किन नामों से पुकारा जाता है ?