आज आप इस आर्टिकल में जानेंगे कि ट्रांसफार्मर क्या होता है और यह कैसे कार्य करते हैं ट्रांसफार्मर सिद्धांत क्या होता है ऑटो ट्रांसफार्मर क्या होता है वेरिएक क्या होता है स्विचस, रिले इन सभी के बारे में जानेंगे ।
ट्रांसफार्मर क्या है ?
वोल्टेज स्टेबलाइजर के प्रमुख अंग होता है ट्रान्सफॉर्मर । यह भारी व अधिक स्थान लेने वाला होता है। ट्रान्सफॉर्मर बिजली का एक ऐसा उपकरण है जो कि वोल्टेज को अधिक step up या कम step down कर सकता है। इसके अन्दर तार की दो कॉयल coils एक मैगनेटिक कोर core पर बंधी होती हैं। इन्हें प्राइमरी primary और सेकन्डरी secondary कॉइल कहा जाता है । कोर बहुत से E और I के आकार के लेमिनेशनों laminations का बना होता है। कुछ ट्रान्सफॉर्मरों में एक से अधिक सेकन्डरी काइलें होती हैं। ट्रान्सफॉर्मर एक ऐसा उपकरण है जिसे स्वयं के लिये कोई विद्युत शक्ति की आवश्यकता नहीं होती, जितनी विद्युत शक्ति प्राइमरी में दी जाती है, लगभग वह सारी शक्ति सेकन्डरी में आ जाती है।
ट्रांसफार्मर का सिद्धांत
ट्रांसफार्मर में प्राइमरी और सेकन्डरी में वोल्टेज और करंट के परस्पर सम्बन्धों के समीकरण इस प्रकार है, एक step down ट्रान्सफॉर्मर की प्राइमरी में जितना वोल्टेज दिया जाता है, सेकन्डरी में उससे कम बोल्टेज मिलता है पर सेकन्डरी करन्ट अधिक दे सकती है। इसलिये इस प्रकार के ट्रान्सफार्मरों में प्राइमरी की अपेक्षा सेकन्डरी में कम turn होते हैं व वह मोटे तार से बनी होती है । Step up ट्रान्सफार्मरों में इसके विपरीत होता है। इनमें सेकन्डरी वाइंडिंग जाइमरी के तार से पतले तार की, और अधिक turns की होती है। यह ट्रान्सफार्मर सेकन्डरी में प्राइमरी से अधिक वोल्टेज देता है पर इसकी करन्ट देने की क्षमता कम होती है। एक ट्रान्सफॉर्मर कितनी विद्युत शक्ति परिवर्तित कर सकता है ।
ट्रांसफार्मर के भाग
वह उसके कोर के मध्य भाग के क्षेत्रफल core area पर निर्भर करता है। यह शक्ति वोल्ट एम्पोयरों volt-amperes में लिखी जाती है। यह संख्या प्राइमरी के वोल्ट और एम्पीयरों को गुणा करके निकाली जाती है। एक ट्रान्सफॉर्मर जिसका core-area एक वर्ग-इन्च है, वह अनुमानतः लगभग 50VA को विद्युत- शक्ति संभाल सकता है। छोटे ट्रान्सफॉर्मरों की कार्य-कुशलता efficiency लगभग 90% होती है । अर्थात् जितनी विद्युत शक्ति प्राइमरी को दी जाती है उसकी लगभग 90% विद्युत शक्ति सेकेन्डरी से प्राप्त होती है। शेष 10% क्षति-प्रस्त विद्युत शक्ति ट्रान्सफॉर्मर को गरम करती है।
अकुशलता से बनाये हुए ट्रास्सफॉर्मरों की कार्य कुशलता इससे भी कम होती है और इस कारण वे अधिक गरम होते हैं। इसलिये उपकरणों में ट्रान्सफॉर्मरों को इस प्रकार लगाना चाहिये कि उन्हें ठंडा रहने के लिये पर्याप्त हवा मिलती रहे। कम हवा मिलने पर वे अत्यधिक गर्म होकर जल भी सकते हैं। सादा और सस्ते प्रकार के वोल्टेज स्टेबिलाइजरों में एक ही ट्रान्सफॉर्मर होता है। अधिकांश ऑटोमेटिक वोल्टेज स्टेबिलाइजरों में एक बड़ा ट्रान्सफॉर्मर लाइन वोल्टेज को सही करने के लिये, और एक छोटा ट्रान्सफॉर्मर इलेक्ट्रॉनिक सकिटों में विद्युत देने के लिये होता है। कुछ निर्माता एक ही ट्रान्सफॉर्मर, जिसमें कई secondary windings होती है। लगाना पसन्द करते है।
ट्रांसफार्मर का सूत्र
ट्रांसफार्मर दक्षता = आउटपुट वोल्टेज / इनपुट वोल्टेज * टर्न अनुपात एनएस/एनपी
ट्रांसफार्मर का कार्य क्या है
उदाहरणार्थ, यदि सप्लाई वोल्टेज 30V से 240V तक ऊँचा नीचा होता भी रहे तो भी एक बिजली से जलने वाले बल्ब की रोशनी में कोई विशेष बन्तर नहीं पड़ेगा। कुछ उपकरण इससे भी अधिक उतार चढ़ाव सह सकते हैं। लाइन बोल्टेज का 210V से 250V तक उतार-चढ़ाव होने पर भी एक इलेक्ट्रिक हीटर को कोई विशेष हानि नहीं होगी। रेडियो, टेलिविजन इत्यादि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का डिजाइन ऐसा होता है कि वे लाइन वोल्टेज में 10% उतार-चढ़ाव सह सकते हैं।
एक ट्रांसफार्मर का उपयोग
आजकल घरों में रेफ्रिजरेटर, मिक्सर, वाशिंग मशीन जैसे बिजली के उपकरणों का और रेडियो, टेप रिकार्डर, विडियो रिकार्डर, हाई-फाई साउन्ड सिस्टम्स जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का प्रयोग दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है। ये सभी उपकरण 230V पर सुचारु रूप से काम करने के हिसाब से डिजाइन किये जाते हैं। यदि इन्हें स्थिर 230V की सप्लाई पर चलाया जाये तो ये सभी उपकरण दीर्घ काल तक अपनी पूर्ण क्षमता से काम करते रहेंगे। इनमें से अधिकांश को सप्लाई वोल्टेज में 5% के उतार- चढ़ाव से कोई हानि नहीं होगी।
ऑटो ट्रांसफार्मर Autotransformers
ऑटो ट्रांसफार्मर में एक ही वाइंडिंग होती है जिसमें कई taps होते हैं। एक ही ऑटोट्रान्सफॉर्मर किस प्रकार वोल्टेज को step up या step down कर सकता है। इसमें एक terminal इनपुट और आउटपुट दोनों में common होता है। यदि आउटपुट B और C टर्मिनलों से लिया जाय तो आउटपुट वोल्ट इनपुट वोल्ट से कम होगा। और यदि आउटपुट B और D टर्मिनलों से लिया जाय तो आउटपुट वोल्ट इनपुट वोल्ट से अधिक होगा। इस प्रकार आप आउटपुट का तार टर्मिनल C से हटा कर टर्मिनल D पर लगा कर आउटपुट वोल्ट आसानी से बढ़ा सकते हैं। एक ऑटोट्रान्सफॉर्मर अपने बराबर आकार वाले सामान्य ट्रान्सफार्मर की अपेक्षा कहीं अधिक विद्यत-शक्ति (power) संभाल सकता है। इसकी मुख्य कमी है इनपुट और आउटपुट के बीच अलगाव Isolation का न होना। क्योंकि एक टर्मिनल इनपुट और आउटपुट दोनों में common होता है। इस कारण से ऑटोटान्सफॉर्मरों का प्रयोग वहीं किया जाता है जहाँ पर इस प्रकार का electrical isolation आवश्यक न हो ।
वेरिएक क्या है Variac
वेरिएक शब्द Variable और AC दोनों से मिलाकर बनाया गया है। मूल रूप से यह एक ऑटोट्रान्सफॉर्मर ही है जो इस प्रकार बनाया गया है कि winding के किसी भी स्थान से आउटपुट लिया जा सके। इसलिये एक वेरिएक शून्य से लेकर लाइन वोल्टेज से भी अधिक कोई भी AC वोल्टेज दे सकता है। बेरिएक में मॉडल एक गोल बड़ी अंगूठी के आकार की कोर पर टीरीकी toroidally बांधी जाती है। कॉल की अ सतह के तार का insulation इतना बुरष दिया जाता हैन्दिरका बाए । अब इस सतह पर एक कार्बन केश के द्वारा किसी भी स्थान पर contact किया जा सकता है। कार्बन ब्रश एक चूमने वाली arm के सिरे पर लगा होता है जिसे घुमाकर ब्रश को कॉइल के इस सिरे से लेकर उस सिरे तक, किसी भी स्थान पर रखा जा सकता है। इस arm को या तो एक नॉब knob द्वारा हाथ से घुमाबा जाता है, या इसे बिजली की एक छोटी मोटर से गति कम करने वाले gears लगाकर घुमाया जाता है। तीन एक-जैसे वेरिएकों को जोड़कर three phase सप्लाई के काम में लिया जाता है। बाजार में मिलने वाले विभिन्न प्रकार के वेरिएक दिखाये गए हैं।
विद्युत स्विच क्या है ? Switch
वोल्टेज स्टेबलाइजर में switch का प्रयोग ऑन-ऑफ़ on-off करने और कनेक्शन बदलने के भिये किया जाता है। इन रुरिटी मे करन्ट मात्रा में अधिक होती है। इसलिये जिन स्विचों के कॉन्टेक्टी की क्षमता 5A या इससे अधिक होती है, वे ही प्रयोग किये जाते हैं। स्टेबिलाइजरों में काम आने वाले यानों, ट्रायंगल और रॉकर प्रकार के स्विच दिखाए गए हैं। इसके साथ ही SPST= Single Pole Single Throw, SPDT = Single Pole Double Throw) और DPDT = Double Pole Double Throw प्रकार के स्विचों को एक और प्रकार का स्विच भी वोल्ट स्टेबलाइजर में लगता है, और वह है कई कॉन्टेक्टों का घूमने वाला रोटेरी स्विच multi-contact rotary switch ये स्विच भारी कॉन्टेक्टों वाले होते हैं क्योंकि इनमें बहने वाली करन्ट की मात्रा अधिक होती है। इन स्विचों को सुगमता से घुमाये जा सकने के लिये एक बड़े साइज की knob का प्रयोग किया जाता है।
रिले किसे कहते हैं ? Relays
रिले बिजली से चलने वाली एक शक्तिशाली स्विच होती है। इसमें एक electromagnet होता है जिसमें करन्ट बहने पर वह एक आर्मेचर armature को खींच लेता है। आमॅचर के साथ भारी contact लगे होते हैं। जो इलेक्ट्रिक सकिट को make या break करते हैं। सामान्य रिले 5 या 10 एम्पीयर तक का करन्ट संभाल सकती है। जिन रिले के कॉन्टेक्ट 25A या अधिक क्षमता वाले होते हैं उन्हें contactor कहा जाता है। एक रिले एक साथ ही कई कान्टेक्टों को break कर सकती है।
रिले का मुख्य कार्य क्या है?
विभिन्न प्रकार रिले को चलाने के लिए बहुत थोड़ी विद्युत-शक्ति की आवश्यकता होती है। स्टेबिलाइजरों में लगाई जाने वाली रिले अधिकांश 720 मिलीवाट milli watts की होती हैं। यानि कि एक 12 volt पर चलने वाली रिले की कॉइल का रेजिस्टैन्स 200 ओम का होगा और वह 60 mA लेगी। उसी रिले में यदि 450 ओम कॉइल होगी तो वह 18V पर चलेगी और 40mA लेगी। अर्थात् वोल्टेज और करन्ट का गुणनफल 720 ही होगा। इतनी थोड़ी विद्युत शक्ति ट्रान्जिस्टर सर्किट आसानी से दे सकते हैं और इस प्रकार रिले द्वारा बोड़ी विद्युत शक्ति से अधिक विद्युत शक्ति को control किया जा सकता है। रिले और उसके कॉन्टेक्टों को एक ही साथ दिखाना अच्छा होता है पर यह आवश्यक नहीं है।
रिले केंद्र क्या होता है?
कई डायग्रामों में रिले एक जगह दिखाई जाती है और उसके विभिन्न कान्टेक्ट दूसरे स्थानों पर। रिले की पहचान के लिये कोई अक्षर या संख्या जैसे कि Relay-A या Relay-1 दे देते हैं और उससे सम्बन्धित कॉन्टेक्टों को भी उसी अक्षर या संख्या से सम्बोधित किया जाता है। डायग्राम में यह स्पष्ट करने के लिये कि रिले उठी हुई energised है या गिरी हुई de-energised, वे कॉन्टेक्ट जो कि रिले de- energised होने पर सामान्यतः जुड़े हुए normally closed रहते हैं उन्हें NC द्वारा, और जो कॉन्टेक्ट इस स्थिति में खुले हुए normally open रहते हैं उन्हें NO द्वारा सम्बोधित किया जाता है।