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सेमीकन्डक्टर डिवाइसेज Semiconductor Devices

by basegyan
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ऑटोमेटिक वोल्टेजस्टेबिलाइजरों में बहुत से कार्यों जैसे कि AC को DC में में बदलना, रिले चलाना, वोल्टेज ज्ञात करना इत्यादि के लिये सेमी कन्डक्टरों से बनी विभिन्न वस्तुएँ जैसे कि डायोड diode, ट्रांजिस्टर transistor, बाइरिस्टर thyristor आदि का प्रयोग किया जाता है। इनके सर्किट अध्ययन के पहले हम इन छोटी परन्तु शक्तिशाली वस्तुओं का अध्ययन करेंगे।

 रेक्टिफायर डायोड Rectifier Diodes

सेमी कन्डक्टरों से बनी चीजों में सब से सरल चीज diode है। डायोड के दोनों सिरों पर एक-एक तार लगा होता है। ये सिरे Anode और Cathode के नाम से जाने जाते हैं। डायोड में विद्युत करन्ट एक ही दिशा में, यानि anode से cathode की ओर, ही बह सकती है। इस गुण के कारण डायोड AC को DC में परिवर्तित करने के लिये खूब काम में लाए जाते हैं। विभिन्न प्रकार anode का एक तार के निशान द्वारा और cathode को एक bar के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। तीर की दिशा डायोड में करन्ट बहने की दिशा दर्शाती है। विपरीत दिशा में वोल्टेज लगाने पर डायोड में करन्ट वहना रुक जाता है। और यदि यह वोल्टेज अत्याधिक हो तो डायोड जलकर या तो short-circuit या फिर open-circuit हो जाता है। सेमीकन्डक्टर डायोड अनेक प्रकार वोल्टेज और करन्ट की क्षमता के बनाये जाते हैं। उदाहरण के लिये 1N4001 और 1N4007 दोनों डायोडों की करन्ट क्षमता IA की है पर इनकी विपरीत दिशा में वोल्टेज सहने की क्षमता क्रमानुसार 50V और 1000V की है। बाजार में डायोड उनके टाइप नम्बर से मिलते हैं। डायोडों के टाइप नम्बर, क्षमता व अन्य गुण विस्तृत रूप से data manuals में दिये गए होते हैं।

ब्रिज रेक्टिफायर क्या है?

चार डायोडों को कनेक्ट करके bridge rectifier बनाया जाता है। इस ब्रिज रेक्टिफायर को काम में लाने के लिये ट्रान्सफार्मर की सेकन्डरी में centre-tap की आवश्यकता नहीं होती। इस प्रकार चार अलग-अलग डायोडों को जोड़ने के बजाय बाजार में मिलने वाले बने बनाए ब्रिज रेक्टिफायर लगाना आसान होता है। ऐसे ब्रिज रेक्टिफायर विभिन्न वोल्टेज और करंट के क्षमताओं में मिलते हैं। इनके ऊपर AC देने के लिये, व DC लेने के टर्मिनल साफ-साफ लिखे होते हैं।

जेनर डायोड Zener Diodes

जैनर डायोड बाहर से तो रेक्टिफायर डायोड जैसे ही दिखते हैं परन्तु वे गुणों में बिल्कुल भिन्न होते हैं। इनका विपरीत दिशा में breakdown voltage कम होता है और ये विपरीत दिशा में ही काम में लाए जाते हैं। इनका विशेष गुण यह है कि चाहे इनमें से बहने वाली करन्ट की मात्रा घटती बढ़ती रहे, इनके दोनों मिनलों के बीच का वोल्टेज स्थिर रहता है। इसलिए जैनर डायोडों का प्रयोग वोल्टेज को स्थिर रखने के लिए और एक स्थिर DC reference voltage देने के लिए किया जाता है। जैनर डायोड अनेक प्रकार की वोल्टेज और पावर (power) की क्षमताओं में बनाए जाते हैं। बाजार में वे टाइप नम्बर से मिलते हैं। इनके टाइप नम्बर व उनके विद्युत सम्बन्धी गुणों का विवरण data manuals में दिया होता है।

ट्रांजिस्टर Transistors

ट्रांजिस्टर सेमीकंडक्टर से बंधी एक छोटी-सी है जो विद्युत करन्ट को बढ़ाने (amplify) के काम आती है। ट्रान्जिस्टर में तीन तार लगे होते हैं जिन्हें एमिटर emitter, बेस base और कलेक्टर collector के नाम से जाना जाता है। बेस और एमिटर सर्किट में 1 mA जैसी थोडी-सी करन्ट कलैक्टर और एमिटर सर्किट में 100 mA या उसने भी अधिक करन्ट पैदा करती है। इसलिए current-amplifier और relay-driver सरकिटों में ट्रान्जिस्टरों का खूब उपयोग होता है।

ट्रांजिस्टर के उपयोग

ट्रान्जिस्टर विभिन्न प्रकार के आकार व आकृतियों में और विविध प्रकार की वोल्टेज व करन्ट की क्षमताओं मे बनाये जाते हैं। बाजार में ये टाइप नम्बर से जाने जाते हैं जैसे BC148, SK100, 2N3055। इनके टाइप नम्बर, तीनों सिरों की पहचान व विद्युत सम्बन्धी विशेष गुण data manuals में विस्तार से लिखे होते हैं। मूल रूप से ट्रान्जिस्टर दो प्रकार के होते हैं। इन्हें pnp और npn कहा जाता है। npn प्रकार के ट्रान्जिस्टरों के लिए positive supply व pnp ट्रांजिस्टरों के लिए negative supply की आवश्यकता होती है। एक जैसे गुणों वाले एक pnp और एक npn ट्रांजिस्टरों के जोड़े बाजार में उपलब्ध हैं। इन्हें complementary pairs कहते हैं। उदाहरण के लिए BC107 व BC177, SK 100 व SL 00 एवं AC 187 व AC 188 कॉम्प्लीमैन्टरी पेअर्स हैं। अनेक स्टेबिलाइजरों में सर्किट को सरल व शक्तिशाली बनाने के लिये complementary pairs का उपयोग होता है।

थाइरिस्टर क्या है? Thyristors

ट्रान्जिस्टरों की तरह थाइरिस्टरों में भी तीन तार होते हैं परन्तु ये करन्ट को बढ़ाने का कार्य नहीं करते। ये स्विच का कार्य बड़ी कुशलता से करते हैं और इसलिये इनका प्रयोग sensitive electronic switch के लिए होता है। थाइरिस्टर की एक प्रकार, जिसे SCR कहते हैं तीन तार का होता है और ये तार anode, cathode और gate कहलाते हैं। SCR अर्थात् silicon controlled rectifier के नाम से ही पता चल जाता है कि यह उपकरण एक रेक्टिफायर और स्विच दोनों का काम करता है। इसके gate-cathode सर्किट में दी गई एक थोड़ी-सी करन्ट इसे ट्रिगर trigger कर देती है और SCR का स्विच पूर्णतया ऑन (on) हो जाता है। इसे ऑफ (off) करने के लिए एनोड पर से सप्लाई वोल्टेज बिल्कुल हटा लेना आवश्यक होता है। SCR में करन्ट का प्रवाह एक ही दिशा में हो सकता है।

थाइरिस्टर परिवार क्या है ?

रेक्टिफायर डायोड की तरह यह भी विपरीत दिशा में करन्ट प्रवाह कर देता है इस कारण से SCR केवल half-wave के स्विच करने के ही काम आ सकता है। Fell-wave AC को स्विच करने के लिए दो SCR परस्पर विपरीत दिशाओं में लगाए जाते हैं और वे अपने-अपने ट्रिगर सर्किटों द्वारा अलग-अलग ट्रिगर किये जाते हैं। एक अन्य प्रकार का तीन तार बाला थाइरिस्टरों, जिसे triac कहते हैं, दोनों दिशाओं में करन्ट स्विच कर सकता है। इस कारण से ट्रायक AC सकिटों में electronic switch की तरह काम में लिया जाता है। ट्रायक के तीन तार MT1, MT2 और gate के नाम से जाने जाते हैं। बाजार में थाइरिस्टर टाइप नम्बर से जाने जाते हैं जैसे कि ST044, 2N3668, T2801 आदि । इनके पिन कनैक्शन, आकृतियाँ और विशेष गुण data manuals में लिखे होते हैं ।

लाइट एमिटिंग डायोड्स Light Emitting Diodes

Light emitting diodes अर्थात् प्रकाश देने वाले डायोड अधिकतर LED के नाम से जाने जाते हैं। एल ई डी छाटे आकार वाले, कम वोल्टेज व कम करन्ट पर चलने वाले, सेमीकन्डक्टर से बने डायोड होते हैं जिनका ऊपरी आवरण पारदर्शी प्लास्टिक का बना होता है। जब इनमें विद्युत प्रवाह सही दिशा में होता है तो ये चमकते हैं। बाजार में LED तीन रंगों में, अर्थात् लाल, हरे व पीले रंगों में मिलते हैं। इनका अधिकतर उपयोग indicator lamp की तरह होता है। सामान्य प्रकार के LFD लगभग 10MA पर काफी रोशनी दे देते हैं। प्रयोग में लाते समय इनके series में एक current limiting resistance लगाना पड़ता है जिससे कि उनके अन्दर प्रवाहित होने वाली करन्ट अत्यधिक न हो जाये। विपरीत दिशा में दोल्टेज लगने पर LED खराब हो जाते हैं।

एकीकृत सर्किट Integrated Circuits

इन्टीग्रेटेड सर्किट, जो कि अधिकतर IC के नाम से जाने जाते हैं, सेमीकन्डक्टर से बने पूर्ण सर्किट होते हैं। इन सर्किट में बहुत से ट्रान्जिस्टर व रेजिस्टैन्स आदि सभी सम्बन्धित सिलीकॉन को एक छोटी सी chip पर बनी होती हैं। एक IC में से बहुत से तार निकलते हैं। अधिकतर प्रयोग में आने वाले IC, यानि कि TO-5 और DIP IC की आकृतियाँ दिखाई गयी है। इन्टीग्रेटेड सर्किट्स दो प्रकार के होते हैं-लीनियर linear और डिजिटल digital एम्पलीफायर्स, वोल्टेज रेग्यूलेटर्स, कम्पेरेटर्स comparators लीनियर प्रकार के IC होते हैं। गेट्स gates, काउन्टर्स counters और शिफ्ट रजिस्टर्स shift registers आदि डिजिटल IC होते हैं। जिन इन्टीग्रेटेड सकिटों में हीमोस CMOS प्रकार के ट्रांजिस्टरों का प्रयोग होता है वे CMOS इन्टीग्रेटेड सर्किट कहलाते हैं। बाजार में इन्टीग्रेटेड सकिट्म टाइप नम्बर से विकते हैं। इनके टाइप नम्बर, बाहरी आकृतियाँ, पिन कनैक्शन और विशेष गुण data manuals में लिखे होते हैं।

इन्डीकेटर्स Indicators

ये उपकरण जिन्हें देखकर अथवा सुनकर किसी सर्किट की तत्कालिक अवस्था का बोध हो, इन्डीकेटर्स indicators अर्थात् सूचक कहलाते हैं। इलेक्ट्रॉनिक वोल्टेज स्टेबिलाइजर्स वोल्ट कट-आउट्स में विभिन्न अवस्थाओं, जैसे कि on/off, स्थिर वोल्टेज उपलब्ध हैं, मेन्स वोल्टेज उपलब्ध है, वोल्टेज बहुत कम है, वोल्टेज बहुत अधिक है, टाइमर timer चल रहा है, आदि को दिखाने के लिये अनेक प्रकार के इन्डीकेटरों का प्रयोग होता है। सबसे सरल प्रकार का सूचक निओन Neon बल्ब है। निओन बल्ब में एक छोटी-सी शीशे की tube होती है। जिसमें निओन गैस भरी होती है। ट्यूब के अंदर दो इलेक्ट्रोड्स electrodes होते हैं जिनके कनेक्शन के तार बाहर निकले होते हैं इस बल्ब के अन्दर से थोड़ी-सी करन्ट बहने पर इलैक्ट्रोड्स चमकने लगते हैं और एक विशेष प्रकार की लाल रंग की रोशनी देते हैं। निओन बल्ब कई आकारों और आकृतियों में बनाये जाते हैं। ये मूल रूप से high voltage पर चलने वाले होते हैं और सर्किट में हमेशा एक 100.000 ओहम के लगभग करन्ट नियन्त्रक रेजिस्टैन्स के साथ लगाये जाते हैं। बाजार में मिलने वाले कुछ निबोन इन्डीकेटरों के case के अन्दर ही करन्ट नियन्त्रक रेजिस्टेन्स लगा होता है। इस प्रकार के इन्डीकेटर सीधे हो 230V की लाइन में लगाए जा सकते हैं। भिन्न-भिन्न अवस्थाओं को दिखाने के लिए निओन बल्बों के केस का ऊपरी पारदर्शक ढक्कन लाल- पीले या हरे रंग का होता है।

विद्युत संकेतक क्या हैं?

एक अन्य बहुत प्रचलित प्रकार का इन्डीकेटर है बिजली का छोटा बल्ब । ये बल्ब अनेक आकारो, आकृतियों, वोल्टेज और करन्ट की क्षमताओं में बनते हैं। इनमें सबसे अधिक प्रचलन screw type base वाले 6.3V/0.3A और 12.6V/0.15A rating के बल्बो का है । इन्हें केबिनेट के सामने की पैनल (panel) में एक छेद पीछे लगाकर छेद को सामने से एक रंगीन या सादा प्लास्टिक से ढक देते हैं। इन बल्बों को लगाने के लिए बाजार में अनेक प्रकार की jewel lights भी मिलती हैं। इन बल्बों की रोशनी इतनी होती है कि कमरे में कैसी भी रोशनी होने पर भी ये एक निश्चित संकेत दे सकते हैं। अध्याधिक वोल्टेज होने पर ये बल्ब fuse हो जाते हैं। उपकरणों के कुछ निर्माता 6V के स्थान पर 12V का बल्ब लगा दते हैं। इससे इन्डीकेटर की रोशनी तो थोड़ी कम हो जाती है पर वे बहुत समय तक चलते हैं और अत्याधिक वोल्टेज होने पर भी fuse नहीं होते। संकेत कार्यों के लिए यह कम रोशनी भी पर्याप्त होती है।

एलईडी इंडिकेटर क्या है?

कम वोल्टेज वाले सकिटों में संकेत कार्यों के लिए आजकल LED का प्रयोग दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है क्योकि इनसे अनेक लाभ हैं। ये आकार में छोटे होते हैं, बहुत कम विद्युत शक्ति से चलते हैं, बहुत कम गर्मी पैदा करते हैं, मजबूत होते हैं और कई रंगों में मिलते हैं। जैसा कि हम पहले बता चुके हैं, इनके series में हमेशा एक करन्ट नियंत्रक रेजिस्टेन्स लगाया जाता है।
संकेत बल्ब यानी इन्डीकेटर लैम्प्स विद्युत उपकरणों के सामने वाली panel पर लगाये जाते है जहाँ वे उपकरण की बाहरी शोभा को बढ़ा भी सकते हैं और घटा भी सकते हैं। इसलिए इन्हें लगाने के लिए कई आकर्षक प्रकार के प्रसाधन बनाए गए हैं। कार की लाईन में बल्ब लगाने के प्रसाधन, नीचे बाँयी बोर LED लगाने के प्रसाधन व दांयी ओर निओन बल्ब लगाने के प्रसाधन दिखाए गए हैं। शाकर्षक प्रकार के प्रसाधन कुशलता से लगाए जाने पर उपकरण को बाहरी शोभा बहुत बढ़ा देते हैं।

मीटर्स Meters

जो भी हो, लाइन वोल्टेज की सही अवस्था बताने वाली सबसे अच्छी चीज है मीटर । साधारणतया मीटर दो प्रकार के होते हैं-मूविंग कॉइल moving coil और मूलिग आयरन moving iron मूविग कॉयल मीटर अधिक कीमत वाले अवश्य होते हैं पर वे बहुत कम करन्ट पर चलते हैं। उनके डायल स्केल बराबर हिस्सों में विभाजित होते हैं और उनकी सुई बिना इधर-उधर हिले सीधी अपने गन्तव्य स्थान पर जाकर ठहर जाती है। मूविंग आयरन मीटर इनकी तुलना में कम कीमत वाले होते है। उनके डायल स्केल छोटे-बड़े भागों में विभाजित होते हैं, वे चलने में अधिक करन्ट का उपयोग करते हैं और उनकी सुई अपने गन्तव्य स्थान पर पहुंच कर कुछ समय तक हिलती रहती है और फिर ठहरती है। इनके अधिक करन्ट लेने के कारण इनका series resistor भी बड़े आकार का होता है और इसे अक्सर मीटर के बक्से के बाहर ही लगाया जाता है। मीटर के डायल स्केल का non-linear होना, अर्थात् छोटे-बड़े हिस्सों में विभाजित होना कभी-कभी लाभप्रद भी होता है। इसमें जब काम में आने वाले मीटर डायल के भाग में बड़े-बड़े हिस्से होते हैं तो मीटर पढ़ने में आसानी होती है। इतना होने पर भी इन मीटरों में damping न होने के कारण सुई काफी समय तक इधर-उधर हिलती रहती है और मीटर पढ़ने में बहुत कष्ट होता है। फिर भी, कीमत कम होने के कारण वोल्टेज स्टेबिलाइजरों में मूविग आयरन मीटरों का खूब प्रयोग होता है। वोल्टेज स्टेबिलाइजरों में सामान्यतः लगने वाले मीटर व उनके डायल स्केल दिखाए गये हैं।

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